colocynth 200 uses in hindi

कॉलोसिन्थिस
(Colocynthis)

[ इजिप्त के एक तरह के गुल्म या पौधे के सूखे फलकी छाल और बीज निकाल देनेके बाद बचे हुए गूदे से इसका टिंचर तैयार होता है। यह फल बहुत तीता है ] –

क्रोधी व्यक्ति जो जरा-सी कोई बात पूछने पर गुस्सा हो उठता है या बुरा मान जाता है, जिन स्त्रियों के अधिक ऋतुस्राव होता है, जो आलसी हैं और जो व्यक्ति जल्दी-जल्दी मोटे हो जाते हैं, उनके शरीर में – इसकी क्रिया जल्दी होती है। किसी भी तरह के स्नायविक दर्द, सिर-दर्द, पेटमें मरोड़ या ऐंठन का दर्द, गृध्रसी-वात ( सायटिका ), कटिवात इत्यादि कई बीमारियों में यह बहुत ही ज्यादा फायदा करती है। जिस समय हवा ठंढी और धूप तेज रहती है, उसी समय अगर कॉलोसिन्थ का प्रयोग किया जाय तो-इसकी क्रिया शीघ्र प्रकट होती है।

मानसिक लक्षण – बहुत उत्तेजित। क्रोध-घृणामय। दर्द- ऐंठन, कोंचने और मरोड़-सा 

चरित्रगत लक्षण
(1) बहुत अधिक क्रोधित होनेके बाद किसी बीमारी का पैदा हो जाना – जैसे दस्त, कै, पेट में दर्द, ऋतु बन्द हो जाना, फिट आना, मस्तिष्क की बीमारी इत्यादि (कैमोमिला)

(2) एकाएक जल्दी से बायीं ओर माथा घुमाने पर सिर में चक्कर आना 

(3) सायटिका नामक स्नायुशूल के दर्द में बायीं उरु-सन्धि में ऐंठन का दर्द, रोगवाली करवट दबाकर सोना

(4) तीर या बिजली की गति की तरह दर्द,  दर्द नीचे बायीं जाँघ में, बायें घुटनेमें और बायें घुटने के पीछे वाले स्थान में चला जाना, दाहिनी ओर का सायटिका का दर्द, उसका नीचे दाहिनी उरू-सन्धि में और दाहिने पैर में चला जाना (नैफेलियम)

(5) रक्तामाशय और अंत्र-प्रदाह (ऐण्टेराइटिस)–पाखाना होने के पहले पेट में जोरका दर्द और कूथन, रोगी हाथ से पेट दबा रखता है  (6) शूलका दर्द या डिम्बकोष का दर्द व तकलीफ-पेट में ऐसा लगना जैसे किसी ने कड़ी चीजसे या हाथसे पेट दबा रखा है, दबाने पर कुछ आराम मिलता है 

(7) मुंह तीता ( इसमें-Q पॉवर ज्यादा फायदा करती है 1-2 मात्रा दें) रहना। शूल का दर्द- पेट में एक तरह का दर्द- जो किसी प्रकारके प्रदाह की वजह से नहीं होता और अगर रोगी सामने की ओर झुका रहे, दर्द वाली जगह दबा रखे, पैर समेटकर या पट लेटा रहे तो कुछ घट जाता है  दर्द के जोर के कारण रोगी अकसर रोता और छटपटाता है  ऐसे दर्द में-कॉलोसिन्थ की निम्न-शक्तिके प्रयोग से तुरन्त लाभ पहुँचाती है ( 200 पॉवर और कई बार मूल अर्क या Q से भी तुरन्त फायदा होते देखा जाता है)। डिम्बकोष इत्यादि के दर्द में या किसी भी बीमारी में ऊपर बताये हुए लक्षण आदि रहने पर-कॉलोसिन्थ के प्रयोगसे तुरन्त दर्द घट जाता है। कॉलोसिन्थ का शूल का दर्द (colic)-बहुत कुछ स्नायुशूल के तरह का होता है और उसके साथ प्रायः कै-दस्त का भी लक्षण रहता है। यह कै-दस्त- दर्द की वजहसे ही हुआ करता है, पेटकी गड़बड़ी की वजह से नहीं (पेचिशकी बीमारीमें इस तरहका दर्द अकसर दिखाई देता है )। कॉलोसिन्थ के दर्द में ऐंठन, मरोड़ या खींचन रहती है। मैग्नेशिया फॉस-उदर-शूलके दर्द में कॉलोसिन्थ के समान है  और बालकों की बीमारी में ये दोनों ही दवाएँ फायदा करती हैं। मैग्नेशिया फॉस का दर्द-गरम फोमण्टेशन या गरम पानी बोतल में भरकर उससे सेकने से घटता है। कॉलोसिन्थ और मैग्नेशिया फाँस-शरीरके नाना स्थानोंके न्युरैल्जिया–जैसे जरायु-शूल, स्नायुशूल, डिम्बकोष का दर्द, सायटिका आदि रोगों में-समान रूप से लाभदायक है । कैमोमिला-भी बहुत-कुछ ‘कॉलोसिन्थ के के समान दवा है  और ये दोनों ही दवाएँ क्रोध-जनित उदर-शुलमें व्यवहृत होती हैं  कैमोमिला में बच्चों के उदर- शूलमें पेट में वायु पैदा होना, अफरा, छटपटाना, रोना, तकलीफ से बेचैन होना आदि लक्षण हैं, किन्तु कॉलोसिन्थ की तरह पैर सिकोड़कर सोना इसमें नहीं है। उदर-शूल ( colic ) के दर्द में-कैमोमिला और कॉलोसिन्थ से फायदा न हो, तो मैग्नेशिया फॉस से फायदा होता है। स्टेफिसेग्रिया-पलकों के फोड़े तथा जिनके दाँत कीड़े लगकर काले हो गये हैं उन बच्चों के उदर-शूल में उपर्युक्त सभी दवाओं की अपेक्षा ज्यादा फायदा करती है। वेरेट्रम में-उदर-शूल के दर्द के साथ ललाटपर ठंडा पसीना होता है बोविस्टा में-पैर सिकोड़े रहने सामनेकी ओर झुकने से दर्द घटनेका लक्षण रहनेपर भी-भोजनके बाद उदर-शूल बढ़ता पायेंगे। इलिसियम ऐनिसिटम-वायु-शूल का तेज दर्द, रोज एक ही समय में दर्द पैदा होना और पेट गड़गड़ाना। डायस्कोरिया– वायु संचित होने के कारण उत्पन्न उदर-शूलमें ज्यादा फायदा करती है  इसका दर्द-नाभि से नीचे की ओर, यहाँ तक कि रागों से शुरू होकर बाद में सारे पेट में फैल जाता है और कभी-कभी तो हाथ-पैर तक चला जाता है। नीचे कॉलोसिन्थ के साथ डायस्कोरिया का अंतर लिखा जाता है –

कॉलोसिन्थ का दर्द-पैर या घुटने सिकोड़कर सोने या सामने की ओर झुकने से कुछ कम पड़ता है। डायस्कोरिया का दर्द ठीक इससे उल्टा है अर्थात् सिकुड़कर लेटने से और बढ़ता है और पीछे की ओर झुकने या सीधे रहने से कुछ घटता है। इसमें दर्द वाली जगह को दबा रखने से दर्द और भी बढ़ जाता है। स्टैनम-बच्चों के उदर शूलमें बहुत फायदा करती है। इसमें बच्चे के पेट को छाती पर रखकर पेट को दबाये हुए टहलने से दर्द घटता दिखाई देता है। कॉलोसिन्थ में–पेटमें दर्द होनेपर बच्चा औंधा सोना चाहता है या सोता है और जब उसे चित लिटाया जाता है तो चिल्लाने लगता है। इसमें पहले मिचली नहीं रहती, किन्तु जब दर्द बढ़ने लगता है तब जी मिचलाने लगता है और के होती रहती है। जब पेट खाली होता है तब सिर्फ ओकाई आती है । लगातार बहुत ही तकलीफदे ओकाई आना, ओकना, मिचली, वमन की अपेक्षा मिचली अधिक-इन लक्षणोंमें प्रायः-ऐण्टिम टार्ट-30 की 1-2 मात्रा प्रयोग करने से फायदा होता है। स्टैनम का दर्द-खब जोर से दबाने से कुछ घट जाता है। बच्चे का दिन-रात रोना और इस रोने के लक्षण के सहारे बच्चों के उदर-शूल में जलापा दिया जाय तो बहुत फायदा होता है। पैर के तलवों में जलन के लक्षण को ध्यानमें रखकर, कॉलिक ( उदर-शूल ) हो या और कोई भी बीमारी हो, फिर चाहे
वह कितनी ही जटिल क्यों न हो-सलफर से फायदा हो सकता है

कृमि-जनित उदर-शूल के दर्द में भी यह फायदा करती है। इसके सेवन से अकसर मलद्वार से या मुंह से कृमि निकल जाती है और शूल का दर्द अच्छा हो जाता है  और साथ ही अन्य उपसर्ग भी दूर हो जाते हैं। अम्लशूल के रोगियों के लिये-रोज कागजी, पाती या महताबी नींबू का रस ऐसे ही चूसना या गरम पानी के साथ दिन में 3-4 बार (भोजनके घण्टे भर पहले और 2 घण्टे बाद और सवेरे व शाम को) पीना बहुत लाभदायक है। [ एक कागजी नीबू को बीच से दो टुकड़े करके उनमें जरा-सा सेंधा नमक और गोल-मिर्च का चूरा बुरककर कण्डेकी आँच पर कुछ देर तक रख देने से, आग की गरमी से नीबू क्रमशः नरम हो जाता है उस नीबू का रस रोज 3-4 बार पाव-भर पानी के साथ पीने से-दर्द घट जाता है, पाचन-शक्ति बढ़ती है और कोठा साफ हो जाता है। मगर जिन्हें डकार, खट्टी के या अम्ल होता हो, उनके लिये किसी तरह की खट्टी चीज या खट्टा फल या खट्टा शरबत आदि पीना बिलकुल मना है। अम्लशूल के रोगी का दर्द जब तक घट न जाय तब तक उसे-दूध-भात और पका पपीता इत्यादि खिलाना और डाभ का (कच्चे नारियलका ) पानी, साबूदाना, आरारोट, बाली वगैरह तरल चीजें पीने को देना चाहिये। कोई भी सब्तजी /तरकारी या अधिक मीठी चीज खाने को न देना चाहिये।

अतिसार और पेचिश

कॉलोसिन्थ के मलका रंग गहरा पीला, ठीक गन्धक-जैसा होता है और उसके साथ फेन मिला रहता है। उसमें पाखाने के साथ-या तो आँव या खून अथवा पित्त, कुछ-न-कुछ मिली ही रहती है। कभी-कभी दस्तके साथ सिर्फ खून जाता है। पेट की बीमारी में-पानी की तरह पतला और कुछ हरे रंग का चिकना दस्त होता है ( अगर ज्यादा दस्त होता है तो कभी-कभी बिना रंगका हुआ करता है और पतले दस्तके साथ आँव मिली रहती है किन्तु पेटमें दर्द नहीं होता)। कॉलोसिन्थ में-सलफर की भाँति मलद्वार की खाल गल जाती है और पाखाना मिकदार में कम होता है तो बार-बार होता है  पाखाना में खट्टी या कागज जलने जैसी एक तरह की तेज गन्ध आती है। इसमें दस्त आनेके पहले पेटमें जोर को ऐंठन और मरोड़ का दर्द होता है  और पाखाने का वेग भी रहता है, वेग इतना ज्यादा रहता है कि रोगी उसे सम्भाल नहीं सकता। पाखाने के समय पेट में दर्द, कुथन, मिचली तथा मलद्वार और मूत्रद्वार में खूब जलन रहती है  पेट का दर्द-पाखाना हो जानेके बाद घट जाता है  किन्तु यदि पाखाना हो जानेके बाद पेट में बहुत दर्द शुरू हो जाये तो वह बहुत ही कष्टकर हो जाता है ।

पेट की बीमारी में- जीभके अग्रभाग में जलन, स्वाद तीता, बहुत भूख, प्यास, मिचली और ओकाई रहती है  इसके सिवा कॉलोसिन्थ में मिचली न रहने पर भी खाई हुई चीजकी या हरे रंग की पित्तकी के, नींद न आना इत्यादि कुछ अन्य लक्षणों का भी हमेशा खयाल रखना चाहिये। कॉलोसिन्थ मेंरोगलक्षण खानेपीनेके तुरन्त बाद ही, कोई खट्टी चीज खाने पर और बच्चों के दाँत निकलने के समय बढ़ते हैं। आमाशय के पेट के शूल या ऐंठन-कॉलोसिन्थ से फायदा न हो तो- मर्क सोल की जरूरत पड़ती है। मैग्नेशिया कार्ब-कॉलोसिन्थ के सदृश दवा है और बच्चे, युवक, वृद्ध सबके लिये समान ही लाभदायक है। बच्चोंकी बीमारी में-बच्चे का बहुत दुबला-पतला और रोगी-सा ( puny and sickly)
रहना, दूध बिलकुल ही सहन नहीं होना, दूध पीये भी तो पाखाने के साथ उसका यों ही निकल जाना, पेट में बहुत ज्यादा ऐंठन होना, बच्चेका दोनों पैर केवल खींचना और पेटकी ओर मोड़कर पड़ा रहना। मैग्नेशिया के दस्त की-गन्ध खट्टी, रङ्ग हरा और पाखाने के साथ सफेद आँव रहती है। पेशाब-दूध-जैसे सफेद रंगके पेशाब में-कॉलोसिन्थ से फायदा होता है

वात

कॉलोसिन्थ का प्रमुख लक्षण है दबाने पर घटना। वात और गठिया-वातमें भी उक्त लक्षण रहने पर कॉलोसिन्थ फायदा करती है। इसके सिवा अन्य दवाओं से तकलीफ घटने के बाद यदि रुग्न स्थान का कड़ापन और शून्यता दूर न हो तो-कॉलोसिन्थ से फायदा होनेकी सम्भावना है। सायेटिका-(गृध्रसी वात )-बाई ओरकी सायेटिका नर्व (चूतर और उसके पीछेकी एक मोटी स्नायु) से दर्द आरम्भ होना और पैर की एड़ी तक फैल जाना। रोगी के हिलते-डुलते ही दर्द बढ़ जाना, पैर और कमर सुन्न हो जाना, जोरसे दबाने और गरम सेंक देने से दर्द का घटना, इन लक्षणों में तथा गाठे कड़ी और टेण्डॉन ( पेशी-बंधनी ) छोटी तथा दबाकर सोनेसे रोगाक्रान्त जंघा के ऊपरकी हड्डी में शून्यता या संकोचन ( cramp ) जैसा दर्द होनेपर कॉलोसिन्थ लाभदायक है (इसमें बहुत बार दाहिनी तरफ भी आक्रमण होता है)।
उपर्युक्त सायेटिका और कमरके वात ( lumbago ) की कॉलोसिन्थ के सिवा-ब्रायोनिया, रस टक्स, कैल्केरिया फ्लोर, इस्क्युलस, सिमिसिफ्युगा, नक्स वोमिका, आर्निका, फेरम, कैलि बाइक्रॉम, टियुबक्युलिनम, सलफर आदि और भी बहुत-सी दवाएँ हैं, जिनसे समय-समय पर विशेष फायदा होते देखा जाता है । ब्रायोनिया-दर्द हिलने डुलनेपर बढ़ना और स्थिर रहनेपर घटना।

रोग वृद्धि– क्रोध, घृणा या अपने किये हुए अपराध जनित मानसिक ग्लानि से 

बाद की दवाएं– बेलाडोना, मर्क, कॉस्टिकम, कैमोमिला, नक्स,सल्फर

सम्बन्ध– बहुत ज्यादा कुंथन के साथ होने वाली पेचिस में मर्क सोल के समान 

क्रियानाशक– कैम्फर, कॉस्टिकम, कैमोमिला, कौफिया, ओपिमयम, स्टैफिसग्रिया

क्रिया का स्थिति काल- 1 से 7 दिन

पोटेंसी- Q, 6,  30, 200

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